कुछ बेपरवाह पंक्तियों का संग्रह

मुबारक़ हो तुम्हें मज़हब की ये चारदीवारी,
मेरा खुदा मुझे मस्ज़िद में बैठने नहीं देता।
काफ़िर है अनजान, ये सारे जहाँ में है मशहूर,
किस पत्थर पे करूँ सिजदा, ये तो बता।

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सुबह की साँस में है रात सी बेहोशी
या मेरे पहलू में सिमटी तेरे इश्क़ की इबारत ।
ज़िस्म से रूह तक है अनजान ख़ामोशी
या मेरे दिल में धड़कती तेरे नाम की इबादत ।

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हँसी के मुखौटे को सच ना समझ अनजान,
आंसुओं की कब्र पे ये उगाये जाते हैं ।
महफ़िलों के सन्नाटे में दिल की आवाज़ तो सुन,
भूलने को ही बेमुरव्वत यार बनाये जाते हैं ।

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हर बुलबुले को छूकर देखा,
उनकी रंगीनियत एक तमाशा ही थी,
हर दिलफ़रोश को खुदा समझा,
उनकी रूमानियत एक ज़नाज़ा ही थी !

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वक़्त के तसव्वुर में बहे जा रहा हूँ,
कोई हाथ थाम ले, कहे जा रहा हूँ,
जुनूं के महल में दिलों के ख्वाब फीके हैं अनजान,
इमारतों की ईटें गिने जा रहा हूँ ।

– चक्रेश मिश्र “अनजान”

सपनो का नीला खून

ये मेरा जीवन क्या है।
कुछ घटनाएँ, चंद बिछड़े लोग।
कुछ यादें जो तेरे मेरे अंदर,
जिन्दा हैं न चाहकर भी।
कुछ लोग हैं जिनकी यादें नहीं छूटेंगी।
कुछ यादें जिनके लोग अपने नहीं रहते।

लोग कहते हैं सपने देखो।
लोग कहते हैं जिन्दा रहो।
वो ये नहीं बताते कि,
जिंदगी एक सपना नहीं है।
बेतरतीब घटनाओं का,
बेहिसाब लोगों का,
एक ढेर है,
जिसमें से कूड़ा बीनने वाले की तरह,
लाचार, निराश, दुत्कारे हुए लोग,
कुछ सपने चुन लेते हैं।
और फिर उन्ही के सहारे,
रातों की सर्दी और दिनों की बेशर्मी,
दूर करने की ताउम्र कोशिश करते हैं।

अब दो विकल्प हैं मेरे पास,
या तो आँखे बंद करके
जिंदगी को एक सपने की तरह जीते रहो।
अनजान, वास्तविकता से दूर।
सोते हुए, मरे हुए के तरह।
या आँखे खोलकर देखो
और समझो कि ये जिंदगी
जीने का कोई अर्थ नहीं है।

जिस तरफ देखो एक रेगिस्तान है,
जिसमे हर तरफ पानी है।
मन में प्यास जैसा कुछ है,
लेकिन ध्यान से देखो तो
ये नीला खून है, सपनो का,
जिसे पीने की शायद मुझमे ताकत नहीं।
शायद रेगिस्तान को मतलब भी नहीं।
क्योंकि मेरे से ज्यादा है
वो मरा हुआ।

– चक्रेश मिश्र “अनजान”

तुम एक कविता हो

मेरे लिए तुम
एक कविता हो
जिसको गुनगुनाने की भाषा
नहीं जानता मैं ।

एक बच्चे की तरह
कुछ कहना है मुझे
पर शब्दों को
नहीं जानता मैं ।

दुनिया के तरीकों में
ये हँसी, चंद आँसू
या मृत्यु की शान्ति
यही जानता मैं ।

तुम पास हो या दूर
तुम्हें हर पल चाहने के सिवा
कुछ कहाँ जानता मैं
कहाँ जानता मैं ।

आगे बढूँ या खड़ा रहूँ
नहीं जानता मैं ।

– चक्रेश मिश्र “अनजान”

छोटा लाल फूल

अशोक के कुछ पेड़
और वो लाल फूल
यही दिख रहा था 
परदे वाली खिड़की के उस पार 

मैं बुत बना
ज़ंजीरों में जकड़ा
बाहर गिलहरियों का खेल देखता
सुन रहा था उसको

वो बता रहा था
जंजीरों के फायदे
क्यों बुत बनना आरामदायक है
क्यों खिड़की को बंद रखना प्रशंशनीय है
क्यों लाल फूलों को भूल जाना सौभाग्यशाली है

उस स्याह दोपहर में
खिड़की के पार लाल फूल के आसपास
खिलखिलाती प्रकृति थी
बाहें पसारे नियति थी

लेकिन मेरे मन का डर
तेज़ हवाओं का डर
जंगली जानवरों का डर
अनजान राहों का डर
आजादी की राह में मिलने वाली कठिनाइयों का डर
भारी था उन सब पर

उसने प्यार से पूछा
उन मुस्कराते बेज़ान बुतों से
क्या एक और सोने की जंजीर पहनोगे
सबने कहा सो कहा
मैंने भी हाँ में सिर हिला दिया

दिल में बैठा इंसान मुझपर ताने कस रहा है
वो देखो छोटा लाल फूल फिर से हँस रहा है

– चक्रेश मिश्र “अनजान”

वही अपराजित ह्रदय हूँ

शाम के गहरे रंगों से
रात का पैगाम आये |
हारकर जो सो गया मैं 
दीप बनकर कौन आये |

मैं सुबह की आग हूँ
सूर्य का उच्छवास हूँ |
तिमिर का संहार करता
मैं समय की आस हूँ |

आज हो सकता हूँ चिंतित
आज हो सकता हूँ विचलित |
लौ जो देखो फड़फड़ाती
न मान मेरी मृत्यु निश्चित |

सुबह होगी कल यहीं पर
यह भरोसा है हमारा |
न सत्य हारे फिर कहीं पर
जुनून ऐसा है हमारा |

नियति के काले रंगों से
काल बनकर मैं लड़ूंगा |
रात कितनी हो विकट पर
विजयी बनकर मैं रहूँगा |

तेरे मेरे हारे दिनों का
वही अपराजित ह्रदय हूँ |
अनजान पथ पर चल पड़ा जो
वही अपराजित ह्रदय हूँ |

एक कोशिश और करता
जयनाद की मधुर लय हूँ |
कल का अपराजित ह्रदय हूँ
आज भी अपराजित ह्रदय हूँ |

– चक्रेश मिश्र “अनजान”

अपने अपने इन्द्रधनुष

क्यों दर्द भरा मैं गीत लिखूं,
या होठों से मुस्कान कहूँ,
तुम समझो भी या ना समझो,
हैं अपने अपने इन्द्रधनुष ।

क्यों रुककर मैं संताप करूँ,
या अज्ञात क्षितिज की ओर बढूँ,
स्वर्ग नरक का भेद कहाँ,
हैं अपने अपने इन्द्रधनुष ।

नश्वर जीवन के पाठ पढूं,
या चलते कदमों का अंत करूँ,
राही राहों का अंत नहीं,
हैं अपने अपने इन्द्रधनुष ।

पल भर क्यों तेरे साथ रहूँ,
या तुझे अभी से भूल चलूँ,
जब मन में तेरे स्थान नहीं,
हैं तेरे अपने इन्द्रधनुष ।

मीलों के पत्थर याद रखूँ,
या झूठे लक्ष्यों का संधान करूँ,
अनजान जगत में अनजान खड़ा,
क्यों देखूं अपने इन्द्रधनुष ।

– चक्रेश मिश्र “अनजान”